अपने गोद लिए गांव को भूल गए पीएम मोदी, आज तक नहीं ली सुध ?

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सुनो सरपंच साहब,, सुनो मंत्री जी, सुनो विधायक जी, सुनो सांसद जी,,, और आप भी सुनिए पीएम साहब,,, जिम्मेदारी तो सबकी है। लेकिन किसने कितना विकास कराया है वो देखने वाली बात है, देश के पीएम मोदी ने कमान संभालते ही मंत्रियों को गांव गोद लेने का कहा था। जिसके बाद उनके विकास की जिम्मेदारी ली थी। लेकिन मंत्रियों विधायकों की बात तो छोड़ो। पीएम मोदी ने जो गांव गोद लिया है उसका हाल ही बेहाल है तो मंत्रियों से क्या उम्मीद रखेंगे। सांसदों से क्या उम्मीद रखेंगे। जब देश के मुखिया ही अपनी बात पर अमल नहीं कर रहे हैं तो दूसरे लोग कहां से उनकी बात मान लेंगे।

अपने गोद लिए गांव को भूल गए पीएम मोदी

2014 में जब मोदी सरकार ने सत्ता की कमान संभाली तो उसके साथ एक फरमान भी सुनाया जिसके चलते हर एक मंत्री को एक-एक गांव को गोद लेने और उसके विकास करने की जिम्मेदारी लेने की बात की गई। उस वक्त बहुत से मंत्रियों ने कई गावों को गोद लिया और उसके विकास में तेजी से लग गए, लेकिन जिस तरह से समय बीतता गया उसी तरह से गोद लिए गए गावों की सुध लेने वाला कोई नहीं बचा। जिस गर्मजोशी से गावों को गोद लेने की बात हुई थी उतनी ही तेजी से वो कागजी पन्नों में ही खो गई।

 

 

तस्वीरों में जो आप ताले लगे हुए स्कूल और चिकित्सालय देख रहे हैं वो हैं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गोद लिए गए वाराणसी के गांव जयापुर की। गांव को गोद लिया गया निर्माण हुए लेकिन उसके बाद उस गांव के साथ कुछ ऐसा हुआ जो आप इन पंक्तियों को पढ़कर समझ सकते हैं।इसके बाद वादों की दुनिया में धोखा खाने के लिए कुछ भी नही होगा,और कल जब भाषा भूख का हांथ छुड़ाकर ,चमत्कारों की ओर वापस चली जाएगी, मैं तुम्हे बातों से उठाकर आंतों में फेंक दूंगा ” धूमिल”

 

धूमिल की इन पंक्तियों के आलोक में आप सांसद आदर्श ग्राम योजना की सच्चाई को देख सकते हैं। क्यूंकि जिस लम्बे चौड़े वायदे और घोषणा के साथ जेपी के जन्मदिवस 11 अक्टूबर को गांवों को गोद लेने की शरुवात हुई थी उन गांवों में टर्म पूरा करने के बाद भी “आदर्श” जैसी कोई चीज़ दिखी ही नहीं। जनतंत्र टीवी आपको उस गांव की तस्वीर दिखाने जा रहा है जिसे ख़ुद पीएम मोदी ने गोद लिया था।

 

लेकिन गांव की तस्वीर कितनी बदली वो आप ख़ुद तय कर सकते हैं। 7 नवम्बर 2014 को पीएम मोदी ने दो साल के लिए जयापुर गांव को गोद लिया था। ये तय हुआ था कि जयापुर में मूलभूत सुविधाओं के विकास के साथ रोज़गार सृजन के लिए माहौल तैयार किया जाएगा। पीएम के गोद लेने के बाद जयापुर की स्थिति में तेजी से सुधार भी हुआ।7 नवम्बर 2014 से 7 नवम्बर 2016 के बीच इन दो सालों में गांव में बैंक,एटीएम,पोस्ट ऑफिस, पेयजल,लाइब्रेरी,सिलाई केंद्र,सोलर प्रोजेक्ट,प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ,नन्दघर,हैंडीक्राफ्ट सेन्टर जैसी तमाम सुविधाएं आयीं। केंद्र से लेकर राज्य तक के तमाम मंत्री-सचिव दौरे पर दौरा करते रहें।

 

लेकिन दो साल के बाद स्थिति बिगड़नी शुरू हो गयी।बैंक जबतब खुलने लगा जबकि एटीएम के खुलने का कोई समय ही नही है।प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का ताला आजतक खुला ही नही और आदर्श कन्या उच्च विद्यालय आज भी उद्घाटन की बाट जोह रहा है। सार्वजनिक शौचालय और सड़कों की स्थिति बदहाल है और रोज़गार सृजन की कोशिशें भी सिफ़र ही रहीं।गांव के लोग कई विकास कार्यों को कागज़ों तक सीमित बताते हैं।गांवों के गोद लेने के मामले को क़रीब से देखने वाले विश्लेषक इसे एक फ्लॉप योजना मानते हैं।सरकारी रवैया और विकास कार्यों को बढ़ा चढ़ा कर बताने की रवायत ने इस योजना को नुकसान पहुंचाया।

 

गांव के किसान इस बात को लेकर दुखी हैं कि सरकार के दावे के बावजूद उनकी कमाई नही बढ़ी है।आज भी खेती में आने वाली लागत की वजह से खेती कर परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है। बिजली की बढ़ी कीमतों की वजह से सिंचाई महंगी होते जा रही है और महंगे खाद ने तो कमर ही तोड़ दी है।गांव के प्रधान भी दबी जुबान में स्वीकार कर रहे हैं कि खेती किसानी को लेकर तमाम प्रयास हुए लेकिन कोई नतीजा नही निकला आज भी खेती से होने वाली आय में कोई बढ़ोत्तरी नही हुई है।

 

जयापुर प्रधानमंत्री मोदी का गोद लिया हुआ गांव था। उन्होंने इस गांव को आदर्श बनाने की ईमानदारी कोशिश भी की लेकिन सरकारी रवैये ने इस महत्वाकांक्षी योजना को फ्लॉप बना दिया। हालांकि जयापुर में बिजली,पानी ,क्रय केंद्र,बैंक और अनुसूचित जाति के लोगों के लिए अटल नगर जैसी सुविधाएं इस योजना की सफलता है लेकिन सड़कों की हालत बन्द विद्यालय और स्वास्थ्य केंद्र , बदतर हालत में सार्वजनिक शौचालय और रोज़गार सृजन की असफ़लता ने इस योजना को फ्लॉप बनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ा।


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